प्रख्यात सिने अभिनेता और आध्यात्मिक मामलों के जानकार आशुतोष राणा का बुंदेलखंड के प्रति प्रेम जग जाहिर है। उन्होंने बुंदलेखंड को समकालिक परिदृश्य में प्रतिष्ठित भी किया है। भोपाल प्रवास के दौरान एक अनौपचारिक भेंट में उन्होंने "इत जमुना उत नर्मदा, इत चंबल उस टौंस छत्रसाल से लड़न की रहू न काहू हौंस..." को उद्धृत करते हुए कहा कि भारत की सांस्कृतिक धरती पर यदि किसी क्षेत्र ने वीरता, भक्ति, लोकसंवेदना और सौंदर्य को एक साथ साधा है, तो वह बुंदेलखंड है।
यह केवल एक भौगोलिक अंचल नहीं, बल्कि भारतीय आत्मा का वह प्राचीन स्वर है जिसमें तलवार की चमक और मंदिरों की शिल्प-साधना एक साथ दर्शित है। बुंदेलखंड की संस्कृति का सबसे प्राणवान पक्ष उसका लोकजीवन है। यहाँ की मिट्टी में एक अद्भुत आत्मीयता है। यहाँ के लोग जीवन को उत्सव की तरह जीते हैं।अपने रोचक और काव्यात्मक अंदाज़ में किस्सागोई करते हुए श्री राणा ने कहा कि मध्यप्रदेश दरअसल मित्रप्रदेश है, जहां पर आकर प्रत्येक व्यक्ति स्वाभाविक रूप से आत्मीयता से भर जाता है।अन्य प्रदेशों में यह भाव देखने में नहीं आता।
भारतीय परंपरा में गंगा को मोक्षदायिनी और यमुना को प्रेम की धारा कहा गया है, किंतु नर्मदा को “जीवंत तपस्विनी” का स्वरूप प्राप्त हुआ। उन्होंने बताया कि शिव पुत्री को अपने पिता से तीन वरदान प्राप्त हुए थे जिसमें से प्रथम- उनके दर्शनमात्र से मोक्ष प्राप्ति, द्वितीय - नर्मदा के कंकड़-कंकड़ को जागृत शिवलिंग के रूप में मान्यता प्राप्त होना और तृतीय जिस साधक को इष्ट की प्राप्ति ना हो रही हो वह नर्मदा तट पर आएगा तो उसे अपने इष्ट की प्राप्ति हो जाएगी।उन्होंने कहा कि नर्मदा परिक्रमा भारतीय आध्यात्मिक परंपरा का एक अद्वितीय अनुष्ठान है,वह नर्मदांचल के भावभरे वातावरण को यूनिक बना देता है।
नर्मदा हमें कुछ नहीं देती पर वह हमारे माध्यम से सबको,सब कुछ देती है,इसीलिए नर्मदांचल के लोग इस क्षेत्र से बाहर निकल कर नक्षत्रों की दैदीप्यमान होते हैं और जो बाहरी व्यक्ति नर्मदांचल में आता है वह इसी प्रेम का होकर रह जाता है।
नर्मदा की कृपा लोकमंगल के लिए होती है
आशुतोष राना के अनुसार नर्मदा की गोद से निकले राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय व्यक्तित्वों का वैशिष्ट्य निजी नही है।प्रतिष्ठा के शिखर फलक पर वे इसलिए स्थापित हुए हैं क्योंकि नर्मदा ने उन्हें स्थानीयता और निजता के लिए नही बल्कि लोकमंगल के लिए निर्मित किया है यही कारण हैं कि महर्षि महेश योगी,ओशो,दादा जी धूनी वाले,दद्दा जी जैसी अनेक शख्सियत नर्मदांचल से निकलकर वैश्विक फलक पर स्थापित हुई हैं और यह क्रम अनवरत जारी है।